रो रही थी वो माँ

​रो रही थी वो माँ,

अपने बच्चे की मौत पर,

उस बच्चे की मौत पर,

जिसे नौ माह तक रखा था उसने अपने गर्भ में,

आदत हो गयी थी,

जिसकी शरारत की, जिद की,

जिसकी आवाज की,

वो आवाज जो प्यार से उसे माँ कहकर बुलाती थी।
रो रही थी वो माँ,

अपने बच्चे की मौत पर,

उस बच्चे की मौत पर,

जिसने मारी थी लात, जब गर्भ में,

तब दर्द तो हुआ था उसे पर मीठा वाला,

उस रात देर से सोयी थी वो माँ, 

क्योंकि तब खुशी से रोयी थी वो माँ।
रो रही थी वो माँ,

अपने बच्चे की मौत पर,

उस बच्चे की मौत पर

जिसके दर्द मे होने से,

 उसे भी दर्द होता था,

रोती थी वो भी,

 जब वह रोता था।
रो रही थी वो माँ,

अपने बच्चे की मौत पर,

उस बच्चे की मौत पर,

जिसने अभी थोड़ी देर पहले ही तो,

उसे माँ कहकर बुलाया था

रोयी थी वो माँ, जब उसने गले से लगाया था।
रो रही थी वो माँ,

अपने बच्चे की मौत पर।
हो रही थी सियासत,

उसी बच्चे की मौत पर,

रो रही थी वो माँ,

 जिस बच्चे की मौत पर।

कमीशन खोरों,कब सुधरोगे, 

जब तुम्हारी पत्नी भी ऐसे ही रोयेगी,

अपने बच्चे का शव पड़ा देख,

कमीशन के पैसों पर,

चैन से थोड़ी न सोएगी।
                                     अनुज प्रताप त्रिपाठी

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खो जाओगी

​खो जाओगी, जब देखोगी, मेरे दिल में खुद की झलकियां।

तुम्हारी हर इक अदा को, दिल की गहराई में सजों के रखा है।।

वो तुम्हारी मुस्कराने की अदा, और वो गुस्सा दिखाना,

चेहरे से जुल्फों को हटा के कानों तक ले जाना,

सब कुछ है।।

सबकुछ है, बस एकबार पलट के देखो तो सही,

कि, खो जाओगी, तुम भी बिल्कुल वैसे ही,

जैसे खो जाता हूँ मै, खुद में, जब भी तुम्हारी याद आती है।।

कुछ दर्द

१. जलने लगते हैं, असफल लोग आपकी सफलता से।

‘परिवार’ शब्द यूँ ही ‘पटीदार’ नहीं बनता।।

२. हम बेवजह ही,  उनकी चीजों पर अपना अधिकार समझते थे।

उनकी नजर मे तो हम नौकर थे, जिन्हें हम अपना परिवार समझते थे।।                                         अनुज प्रताप त्रिपाठी

मेरी कलम

​एक दिन अपनी भी कलम में वो बात होगी।

लिखूंगा खामोशी, फिर भी आवाज होगी।।

                           

                                अनुज प्रताप त्रिपाठी

Inter caste love:- Part 7

उस दिन साथ चाय पीने के बाद कई दिनों तक पण्डित की देवसेना से मुलाकात न हुई, पण्डित को लगा शायद उनकी वजह से देवसेना ने कोचिंग आना ही बन्द कर दिया। उन दिनों पण्डित बहुत दुखी रहने लगे, दुख इस बात का नहीं था कि उनका प्यार मुकम्मल न हो सका, दुख तो इस बात का था कि कोई लड़की जिसको वह बेइंतहा चाहते हैं, उसने उनकी वजह से कोचिंग छोड़ दी, दुख इस बात का था कि उनकी वजह से उसे दुख हुआ होगा।

एक दिन पण्डित की क्लास कुछ देर से खत्म हुई। वह जैसे ही कोचिंग से बाहर निकले सामने से देवसेना आती हुई दिखाई पड़ी, पण्डित देवसेना को देख वहीं खड़े हो गये पर देवसेना उन्हें इग्नोर करते हुए कोचिंग चली गयी। तब पण्डित को पता चला कि मैडम ने 10:30 वाली बैच ज्वाइन कर ली है। पण्डित को थोड़ा सुकून मिला कि चलो देवसेना ने कोचिंग तो नहीं छोड़ी है पर उसका यूँ इग्नोर करना पण्डित को चुभ गया।

अगले दिन पण्डित क्लास से निकलनें के बाद फिर वहीं मोड़ पर खड़े होकर देवसेना का इन्तजार करने लगे। वो आयी और आज फिर से पण्डित को इग्नोर करके निकल जाना चाहती थी तभी पण्डित ने कहा:- पहचान नहीं रही हो क्या ? जो ऐसे अनदेखा कर रही हो ? तुम्हारा यूँ अनदेखा करना दिल को बहुत दुखाता है।

देवसेना कुछ बोले बिना ही अनसुना करते हुए चली गयी।

अगले दिन कोचिंग के बाद फिर से पण्डित मोड़ पर खड़े हो गये.. देवसेना आयी तो पण्डित ने रोक लिया। बोले देखकर, अनदेखा और सुनकर, अनसुना कर देने के पीछे की वजह क्या है ?

देवसेना बोली:- तुम्हें भूलने की कोशिश कर रही हूँ, ज्यादा नजदीकियां न बढ़ाओ, अभी तुम ही पसन्द आये हो कहीं तुम्हारा #कैरेक्टर पसन्द आ गया तो तुम्हें भुला नहींं पाऊंगी।

देवसेना तो आगे बढ़ गयी पर पण्डित वहीं खड़े रह गये, सोचने लगे, ये प्यार नहींं तो और क्या है ?

ये इश्क भी ना, आसान थोड़ी है… उसपर ये जिद्दी दिल, जो आसानी से मिल जाए उसकी मांग कहाँ करता है, जिद तो उसकी है जिसे पाया न जा सके।

अगले दिन पण्डित कोचिंग के बाद फिर से मोड़ पर खड़े हो गये, देवसेना आयी तो रोककर कह दिया:- बताया था तुमने  कि तुम भी प्यार करती हो मुझसे, रह नहीं सकती तुम भी मेरे बिना। मुझे ये भी पता है, याद करती हो मुझे हर उस पल जब तुम अकेले होती हो, ये हिचकियां मुझे यूँ ही नहीं आती। पर्यावरण पार्क मे आज शाम 5 बजे इंतज़ार करूंगा, मुझे पता है तुम आओगी,खुद को रोकने की कोशिश ना करना।

इतना कहकर पण्डित चले गये और देवसेना भी कोचिंग चली गयी।

शाम पांच बजने से पहले ही पण्डित पर्यावरण पार्क पहुंच गये और एक कोने में बने प्राकृतिक चबूतरे पर बैठ देवसेना का इन्तजार करने लगे। मन में बेचैनी थी कि वो आएगी भी या नहीं ? ऐसी स्थिति मे व्यक्ति आशा और निराशा के सभी पहलुओं पर खुद ही प्रश्न करता है और उत्तर भी खुद ही दे देता है और उत्तर ऐसा जिससे उसे आत्म संतोष हो। आखिर सभी अपनी अपनी कहानी के हीरो होते हैं और जब कहानी अपनी हो तो, अपनी कभी हार नहींं होती, हाँ वास्तविकता की बात और है।

पण्डित आशा और निराशा मे डूबे ही थे कि देवसेना आती हुई दिखाई दी, जब देवसेना कुछ पास आ चुकी थी तो पण्डित खड़े हो गये।

देवसेना ने पण्डित के पास पहुंंचते ही पण्डित के होठों पर अपने होंठ रख दिए और पण्डित को चूमने लगी, पण्डित आश्चर्य में पड़ गये, शरीर पहले की दशा मे यूँ ही खड़ा रहा, चेहरे पर आश्चर्य के भाव और शरीर उत्तेजित होने की जगह संवेदनहीन, देवसेना कभी होठों को चूमती तो कभी गालों को तो कभी माथे को, पण्डित के पवित्र प्रेम मे तो अभी ऐसी कल्पना भी नही हुई थी।

दो मिनट हुए होंगे, पर इस दो मिनट की याद सदियों तक रहने वाली है।

जब देवसेना ने पण्डित को चूमना बन्द किया तो उसकी आंखों मे आंसू थे, पण्डित को कुछ भी समझ नहींं थी कि ऐसे में क्या बोलें , वो तो अभी भी आश्चर्य मे ही डूबे थे। अगले पांच मिनट तक दोनों ऐसे ही खड़े रहे होंगें, देवसेना रोये जा रही थी और पण्डित आश्चर्य मे खड़े सिर्फ वास्तविकता और कल्पना मे अन्तर ढूँढने का प्रयास कर रहे थे। फिर देवसेना अपने आंसूओं को पोछते हुए बोली:- यही चाहते थे ना तुम ? लो अब हो गया, अब तो खुश हो ना ? हाँ अच्छे लगते हो तुम मुझे, प्यार हो गया है मुझे भी तुमसे, पर मेरी कुछ मजबूरियाँ है, कितनी बार कहना पड़ेगा तुमसे, मैं इतना आगे नहीं जाना चाहती जहाँ से लौटकर आना नामुमकिन हो जाए। नहीं जा सकती मैं अपने परिवार के खिलाफ और चलो पल भर को मान भी लूँ कि परिवार वाले किसी तरह समझ भी जाएँ तो क्या वो इस समाज की घटिया व्यवस्था के खिलाफ जा सकेंगे.. नहीं, कभी नहीं जा सकते।

और हाँ, आज भी रोक रही थी मैं खुद को, पर रोक न सकी और सच कहूँ तो रोकने के साथ साथ मैं आज फिर से मिलना चाहती थी तुमसे, तुम्हें बता देना चाहती थी कि तुम्हें ना देखूं इसीलिए कोचिंग का समय बदला है मैनें, और अब फिर से बदलने जा रही हूँ, अगर सच मे चाहते हो मुझे तो मेरी मजबूरियों को समझने की कोशिश करना।

देवसेना रोते हुए चली गयी और पण्डित वहीं बैठ गये और घण्टों तक बैठे ही रहे। जिन्दगी मानों रुक सी गयी हो, सांसें चल रही थी पर अब हवा मे वह ताजगी ना थी, दिल धड़क रहा था पर धड़कनों मे जीने का रोमांच न था,  कुछ सोचना चाहते थे, उसकी मजबूरियों को समझना चाहते थे पर दिमाग सोचने, समझने की स्थिति मे नहीं था। समझाना चाहते थे, दिल को। पर वो लोग और होंगे जिनके दिल मे भी दिमाग होता है, पण्डित का दिल तो जिद्दी है, नासमझ है, समझता भी तो कैसे ? भावुकता थी इस उलझन का इलाज, पण्डित का दिमाग जब कुछ सोचने, समझने की स्थिति मे आया तो पण्डित भावुक हो गये… हाए पण्डित, प्यार मे तुम हारे नहीं, तुम्हारी जीत हुई है। इतना प्यार करती है वो तुम्हें… रो रही थी, क्योंकि बिछड़न का दर्द उसे भी था… सच्चा प्यार यही तो है, अधूरा ही सही पर पूरा सा लगता है… हाँ पण्डित पूरा हो गया है तुम्हारा प्यार, वो भी तुम्हें उतना ही चाहती है, जितना तुम उसे।



गधों का संयम

​आम तौर पर बारिश में भीगते गधों का संयम देखते बनता है, तेज बारिश मे भी एक ही जगह खड़े रहकर भीगते रहते हैं। क्या सोचते रहते हैं ये तो नहीं बयां कर सकता पर हाँ कुछ तो जरूर सोच रहे होते हैं, बिल्कुल गम्भीरता से, घण्टों तक एक ही जगह खड़े रहकर सोचते हैं।
पर ये गधा शायद उतना गधा नहीं था जितने गधे दूसरे गधे होते हैं.. तभी तो बारिश मे भी असयंमित हुआ चला जा रहा था अपनी किसी मंजिल की ओर….
मंजिल..? गधों की ? क्या गधों की भी अपनी कोई मंजिल होती है ? तो भैय्या बस इतना कहूँगा कि इन गधों की साइकोलाजी गधे ही जाने।

शायद उसका संयम ऐसे ही टूट रहा हो जैसे हिन्दुत्व के नाम पर मोदी और योगी को वोट देने वाले हिन्दूओं का उनके (मोदी और योगी के) सेकुलर और दलित रवैये को देखकर टूट रहा है।

पर इस गधे की भांति आप अपने संयम को टूटने न दीजिए बल्कि अन्य गधों की तरह संयम बनाए रखिए, आखिर पिछले तीन सालों मे हज की सब्सिडी में 172 करोड़ रूपये की कटौती हुई है इसे हम सेकुलरिज्म तो नहीं कहेंगे ना? और प्रधानमंत्री का इजराइल दौरा भी तो उनके हिन्दूत्व के एजेंडे को दर्शाता है? इधर यूपी मे भी अब आपकी हिन्दू वादी सरकार बन गयी है जिन्होंने गायोंं के नाम पर खूब राजनीति की पर सरकारी गौशालाएं नहीं बना रहे, जो कुछ बनी भी हैं तो उनका क्रियान्वयन उचित नहीं है… पर आप संयम बनाए रखे आखिर हमने सरकार पांच साल के लिए चुनी है।

बस जब बात देश के विकास की हो तो संयम गधे वाला नहीं इंसानों वाला होना चाहिए।

भारत बिजली व्यवस्था के मामले मे 2015 के 99वें नम्बर से 2016 में 26वें नम्बर पर आ गया।

विदेशी पर्यटकों के भारत भ्रमण के मामले मे 52वें से 40वें नम्बर पर आ गया।

आज भारत विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनकर उभर रहा है।

भ्रष्टाचार का अन्त तो पूर्णतः नहीं हुआ पर फिर भी बड़े घोटाले नहीं हो रहे इतना कम है क्या ?

नोटबन्दी और अब जीएसटी से भारत मे टैक्स कलेक्शन बढ़ने जा रहा है इससे देश का ही तो विकास होगा।

तो आप सरकार पर भरोसा रखे और इन्सानों वाला संयम बनाए रखे, हाँ असंयमित जरूर बने पर तब जब कोई सरेआम किसी लड़की से छेड़छाड़ कर रहा हो, असंयमित बने जिससे निर्भया काण्ड, रिया गौतम और गुड़िया जैसी लड़कियों के साथ अमानवीय घटना फिर न होने पाएं।

असंयमित जरूर हो पर चीनी समानों के प्रति, जिससे चीन फिर कभी भारत को आंख न दिखा सके।

शायद वह गधा भी आज किसी अमानवीय कृत्य या चीन की हरकतों जैसी ही किसी समस्या को लेकर असंयमित हुआ हो।

खैर #बारिश में संयम न दिखाना नहीं तो सर्दी लग जाएगी।

                             अनुज प्रताप त्रिपाठी

     

वो और उनकी यादें

​कैसे रोक लें वो अपनी यादों को मुझ तक आने से।

जो खुद तन्हाई में मुझे याद करते हैं।।

हाँ करता हूँ मै मिन्नतें उन्हें पाने की।

पर वो क्या मुझसे कम फरियाद करते हैं।।

कहते तो हैं वो, कि तुम्हें भुला दिया

पर मुझे मालूम है, वो आज भी छिप छिपकर मेरा दीदार करते है।।
                                                            अनुज प्रताप त्रिपाठी

Inter caste love:- Part 6

#अवन्तिका_की_चाय

पण्डित आज पूरी तैयारी के साथ कोचिंग पहुंचे… पूछो मत.. पूरा जमा के आए थे पण्डित…फंकी हेयरस्टाइल, फिला का एंकल शूज,  पीटर इग्लैण्ड की टी शर्ट और ली कूपर की जीन्स….#ब्रांड_फैक्टरी लग रहे थे पण्डित… थोड़ा बॉडी से मार खा जाते हैं नहीं फोर्स 3 मे जान इब्राहिम की जगह पण्डित को ही कॉस्ट किया जाए। और परफ्यूम की तो मानो पूरी बोतल ही लगा ली थी… ससुरा जिधर से गुजरते पूरा माहौल रोमांटिक हो जाता।

इधर देवसेना भी कहर ढा रही थी… पूरी कोचिंग मे एक ही तो मॉडल हैं और उसपर ये साज सज्जा… आय हाय… देवसेना को कोचिंग मे इस तरह देखकर लड़को के दिमाग मे वो भोजपुरी गाना तो जरूर आया होगा…

कालेज मे मॉडल आइल बा, हर लइका पगलाइल बा।।

और इधर पण्डित का लबेरिया और बढ़ गया.. साला दिल उछल के बाहर निकल आना चाहता था ये तो फेफड़ों का शुकर है कि दिल को रोके रखा….

कोचिंग के दो घण्टे मे एक घंटे तो पण्डित ने देवसेना को ही देखा होगा और देखते भी क्यों न ? आज देवसेना मानों पूर्णिमा की चाँद की तरह अपने पूरे शबाब पर थी।

कोचिंग खत्म हुई तो पण्डित कोचिंग के गेट के बाहर देवसेना का इन्तजार करने लगे जब देवसेना बाहर आयी तो पण्डित ने कहा:- इतना सज धज के क्यों आयी हो आज… जान से मारने का इरादा है क्या ?

देवसेना हंस पड़ी और बोली:- तुम भी कुछ कम नहीं लग रहे।

पण्डित:- चलें ?

देवसेना:- तुम चलो मै पीछे आ रही हूँ… साथ मे किसी ने देख लिया तो ?

पण्डित:- ओके, फाइन… अवन्तिका आ जाओ.. मैं वहीं तुम्हारा बेट करूँगा।

देवसेना:- हम्म चलो तुम।

पण्डित इधर अवन्तिका होटल पहुंचे और एक टेबल पर कब्जा जमा लिया। देवसेना भी आ गयी, पण्डित ने फिल्मी स्टाइल मे देवसेना के बैठने के लिए कुर्सी पीछे की और देवसेना भी स्माइल देते हुए बैठ गयी फिर पण्डित भी देवसेना के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गये।

पण्डित मुस्कराते हुए बोले:- थैंक्स फॉर कमिंग।

देवसेना :- एक्चुएली थैंक्स की जरूरत नहीं है मैं खुद तुमसे कुछ बात करना चाहती थी, सो आ गयी।

इतना कहने के साथ देवसेना के चेहरे पर गम्भीरता आ गयी।

पण्डित:- तो कहो क्या कहना चाहती हो ?

देवसेना :- तुम भी तो कुछ कहने वाले थे तो पहले तुम ही कह दो।

पण्डित:- मेरे कुछ भी कहने का तब तक कोई मतलब नहीं बनता जब तक तुम्हारी सहमति न हो, तो पहले तुम कह दो उसके बाद अगर कहने को हुआ तो कहूँगा… वैसे भी मैनें अपनी फीलिंग्स तो पहले ही तुम्हें बता दी हैं।

देवसेना:- ओके… मैं ही कहती हूँ.. देखो, तुम मुझे अच्छे लगते हो… अच्छे क्या.. बहुत अच्छे लगते हो और मुझे ही क्या… शायद ही कोई लड़की हो जिसे तुम पसन्द न हो पर…

पण्डित:- पर क्या ?

देवसेना:- पर हमारे बीच कुछ नहीं हो सकता।

अब पण्डित कुछ बोल न सके चेहरा मुरझा गया, सोचने लगे अभी कुछ देर पहले तक तो सब सही था ये अचानक क्या हो गया।

देवसेना:- देखो यार, मैं कोई शहर की लड़की तो हूँ नहीं जो अपने फैसले खुद करती हो, गांव की एक साधारण फैमिली की लड़की हूँ जिसकी जिन्दगी के सारे फैसले उसके घर वालों को ही करने हैं… तुम समझ रहे हो ना?

पण्डित ने हाँ में सिर हिला दिया…

देवसेना:- मैं नहीं चाहती की हमारे बीच कुछ भी ऐसा हो जिससे मुझे… तुम्हें और हमारे परिवार को कोई समस्या हो… मेरे हिसाब से तुम्हारे लिए भी इतना आसान नहीं होगा।

पण्डित:- आसान तो नहीं होगा मैडम पर मुश्किल भी नहीं होगा बस तुम एक कदम बढ़ाकर साथ आने की हिम्मत तो दिखाओ।

देवसेना:- हिम्मत तो दिखा दूँ पर जब कल को तुमसे विछड़ना पड़ेगा तो ये दर्द मैं सह नहीं पाऊंगी, पता है ? मुझे भी तुमसे उसी दिन प्यार हो गया था जब गेट पर तुम्हें पहली बार मेरी तरफ देखते हुए देखा था…तुम्हारी आंखों में मैं भी उसी वक्त डूब जाना चाहती थी पर खुद को सम्भालती रही… तुम जब मोड़ पर खड़े रहते थे तो जानबूझकर तुम्हें इग्नोर कर देती थी पर फिर भी मैं खुद को सम्भाल न सकी…. घर पर भी अक्सर तुम्हारी याद आ जाती है…. और उस दिन जब तुमने इनडायरेक्टली मुझे प्रपोज किया.. उस दिन तो मैं सो भी नहीं पायी थी, पूरी रात करवटे बदलती रही। उसके बाद तुम कई दिनों तक कोचिंग नहीं आए, मैं रोज तुम्हारे आने का इन्तजार करती थी ….. जब तुम्हे चार पाँच दिनों तक देख न पाने का दर्द मैं नहीं सह सकती तो प्यार की उस अन्तिम सीमा पर पहुचने के बाद वापस आना मेरे लिए नामुमकिन हो जाएगा। मैं उस दर्द की कल्पना से ही डर जाती हूँ, जब वह सामने होगा तो क्या ?

पण्डित कुछ बोलने की हिम्मत न कर सके क्योंकि इस समाज की सच्चाई से पण्डित भी वाकिफ हैं ये विछड़न का डर तो कहीं न कही पण्डित को भी था। पर देवसेना से एक बात पूछ बैठे :- जब तुम ये कहने के लिए आयी थी तो इतना सजने की क्या जरूरत थी ? क्या दिल तोड़ने के लिए भी सजना जरूरी है ?

देवसेना पण्डित का ये दर्द से भरा व्यंग सुनकर रो पड़ी.. रोते हुए कहा :-  खुद को रोकने की कोशिश तो बहुत की थी … पर तुमसे मिलना था तो खुद को सजने से रोक न सकी… पर यकीन मानों तुमसें कहीं ज्यादा दर्द मुझे हो रहा है।

इधर बेटर दो चाय लेकर आ गया…. अब इतने दर्द मे चाय कौन पीता है पर पण्डित को लगा कि कभी मौका मिले न मिले एक याद ही सही ये याद तो रहेगी….बेटर से एक चाय वापस ले जाने को कहा और एक खाली कप मांगते हुए देवसेना से बोले:- जिन्दगी न सही एक चाय तो शेयर कर ही सकती हो ना मेरे साथ..

देवसेना कुछ बोल न सकी बस हाँ मे सिर हिला दिया…दोनो ने एक ही कप चाय के दो हिस्से कर एक साथ पिए फिर एक दूसरे को खुश देखने के लिए चेहरे पर थोड़ी मुस्कान के साथ होटल से चले गये।

पण्डित मायूस थे पर साथ ही दिल मे एक खुशी थी कि वो भी उन्हें उतना ही चाहती है जितना पण्डित उसको…. खुद को समाज से लड़ने का हौसला देने की कोशिश की और खुद से कहने लगे…. “अब जिन्दगी है तो यही है नहीं तो कोई नहीं”

शाम को फेसबुक पर स्टेटस आया…

Today had tea with prettiest #Devsena..Both of us decided to make some memorable moments

To be continued

Inter caste love – part 5

​देवसेना मुस्कुरा कर चली तो गयी थी पर इधर पण्डित के दिल की बुझती हुई आग मे घी डाल गयी।
पण्डित कोचिंग से रूम पर पहुंचे तो कमरे मे बैठते ही सोचने लगे… कितनी मासूमियत से कह दिया उन्होंने, यूँ मायूस न रहा करो मुझे अच्छा नहीं लगता… अब उन्हें कौन बताए कि उनकी मासूमियत ही तो है जो मेरी जान पर बन आयी है।
पिछले दो दिन से पण्डित जिस दिल को समझाने की कोशिश कर रहे थे वह दिल आज पण्डित की एक भी सुनने को तैयार न था

पण्डित दिल की इस आग को बुझाने की जितनी कोशिश करते आग उतनी ही बढ़ती जा रही थी… जितना ही देवसेना के बारे मे सोंचते दिल मे उतनी ही चुभन होती… प्यार की चुभन… जो मीठा दर्द देती है… पण्डित इस दर्द से निजात भी पाना चाहते थे और इस मीठे दर्द मे डूबे भी रहना चाहते थे।
हाय पण्डित ये इश्क का दर्द भी ना…. जिसे हुआ है बस वही समझे…. इसकी मीठी चुभन दिल को अच्छी भी लगती है और दर्द भी देती है।
आज कब दिन ढला और कब रात आयी पण्डित को कुछ पता न चला…भूख-प्यास भी भूल गये पण्डित…. विस्तर पर लेटे लेटे करवटे बदलते रहे… कभी खुद को इस प्यार मोहब्बत से दूूूूर रहने को कहते तो कभी देवसेना की मुस्कान मे इश्क के मुकम्मल होने की आशा ढूँढने लगते।
वह प्यार करने वाला ही क्या जिसमें अपने प्यार को पाने की आशा ही न हो, तड़प न हो और वो इश्क ही कैसा ?

आंखें खुली थी पर सामने का नजारा धूमिल था… मन प्यार के सतरंगी सपनों की दुनिया मे खो गया था।

अगले दिन पण्डित कोचिंग पहुंचे तो मन मे अजीब सी बेचैनी थी… क्लास मे आगे वाली सीट पर बैठ तो गये पर साथ मे दिल मे एक डर भी बैठ गया… प्यार के भवसागर को पार न कर पाने का भय…
देवसेना क्लास मे आ गयी…. पण्डित को देखकर मुस्कराई तो पण्डित भी मुस्कुरा दिये पर इस मुस्कान मे दर्द था… देवसेना की प्यार भरी मुस्कान ने पण्डित का दिल चीर दिया था। आंखों आंखों मे कुछ बाते हुई पर क्या बात हुई ये दो प्यार करने वाले ही समझें ।

क्लास शुरू हुई… इधर क्लास चल रही थी उधर पण्डित बस देवसेना को ही देखे जा रहे थे… देवसेना भी बीच बीच में पण्डित की ओर देख लेती। दोनों की आंखें जैसे ही मिलती होठों पर हल्की सी मुस्कान दौड़ जाती।
पण्डित इधर ख्यालों मे गुम थे सोच रहे थे देवसेना से बात आगे कैसे बढ़ाई जाए…
क्लास खत्म हुई तो पण्डित ने थोड़ी हिम्मत दिखाई, देवसेेेेना से पूूूछा:-  चाय पीने चलोगी मेरे साथ ?
देवसेना मुस्कुराते हुए :-  क्यूँ डेट पर ले जाना चाहते हो मुझे ?

मुस्कान देखकर पण्डित का हौसला बढ़ गया, बोले:- ऐसा ही समझ लो मैडम।

देवसेना थोड़ा हिचकते हुए बोली:- अभी ?
पण्डित:- हाँ.. अभी, चल सकती हो ?
देवसेना :- नहीं अभी नहीं… इतना आसान थोड़ी है, मुझे थोड़ा टाइम मैनेज करना पड़ेगा…. कल चलें.. ? कल कम्प्यूटर की क्लास ड्राप कर दूंगी ।
पण्डित:- ओके फाइन… डन।
और कुछ बातें करते हुए दोनो चले गये।
#To_Be_Continued

Quote…

​डरते थे जो कभी हमसे, नजरें मिलाने में।

देख जख्मों को मेरे नमक लगाने आ गये।।

कल से नहीं निकलेगा,ऐसा सोंचकर।

ढलते सूरज को दीपक दिखाने आ गये।

कल फिर निकलेगा.. कल फिर चमकेगा।

और इसी चमक से तुम्हारी आंखों मे रोशनी आएगी।।

इक सलाह है…

 ज्यादा देर घूरकर मत देखना।

वरना आंखों की रोशनी हमेशा के लिए छिन जाएगी।।

                                               अनुज प्रताप त्रिपाठी